सुनीता ने कहा, “दीदी, अब जब कभी जस्सूजी आपको रात को जम कर चोदे और अगर बदन में दर्द हो तो दूसरी सुबह मुझे बेझिझक बुला लेना। मैं आपकी ऐसी ही अच्छे से वर्जिश भी करुँगी और पूरी रात की आप दोनों की काम क्रीड़ा की पूरी लम्बी दास्तान भी आपसे सुनूंगी। आप मुझे सब कुछ खुल्लमखुल्ला बताओगी ना?”
ज्योतिजी ने हँसते हुए कहा, “अरे पगली, मैं तो चाहती हूँ की तुझे हमारी चुदाई की दास्ताँ सुनाने की जरुरत ही ना पड़े। मैं ऐसा इंतजाम करुँगी की तुम हमें अपनी आँखों के सामने ही चोदते हुए देख सको।”
फिर सुनीता की और देख कर धीमे सुर में बड़े ही गंभीर लहजे में बोली, “पगली हमारी चुदाई तो देखना ही , पर मैं तुम्हें जस्सूजी की चुदाई का स्वअनुभव भी करवा सकती हूँ, अगर तुम कहो तो। बोलो तैयार हो?”
यह सुनकर सुनीता को चक्कर आगये। ज्योतिजी यह क्या बोल रही थी? भला क्या कोई पत्नी किसी और स्त्री को अपने पति से चुदवाने के लिए कैसे तैयार हो सकती है? पर ज्योतिजी तो ज्योतिजी ही थी।
सुनीता की चूत ज्योतिजी की बात सुन कर फिर रिसने लगी। क्या ज्योतिजी सच में चाह रही थी की जस्सूजी सुनीता को चोदे? क्या ज्योतिजी सच में ऐसा कुछ बर्दाश्त कर सकती हैं? सुनीता ने ज्योतिजी की बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसके मन में घमासान मचा हुआ था। वह क्या जवाब दे? एक तरफ वह जानती थी की कहीं ना कहीं उसके मन के एक कोने में वह जस्सूजी का मोटा लण्ड अपनी चूत में डलवाने के लिए बेताब थी। दूसरी और अपना पतिव्रता होना और फिर उसमें भी अपनी राजपूती आन को वह कैसे ठुकरा सकती थी?
सुनीता ने बिना बोले चुपचाप ज्योतिजी की पीठ का मसाज करते हुए अपने हाथ निचे की और किये और ज्योतिजी के करारे, कड़क और फुले हुए स्तनों को हलके से एक बाजू से रगड़ना शुरू किया। सुनीता की चूत ज्योतिजी की गाँड़ को छू रही थी। सुनीता को तब समझ आया की क्यों मर्द लोग औरत की गाँड़ के पीछे इतना पागल हो रहे होंगें। ज्योतिजी की गाँड़ को अपनी चूत से छूने में सुनीता की चूत रिसने लगी।
ज्योति जी की नंगी गाँड़ पर वह पानी जब “टपक टपक” कर गिरने लगा तब ज्योति जी अपना मुंह तकिये में ही ढका हुआ रखती हुई बोली, “देखा सुनीता बहन! किसी प्यारी औरत की नंगीं गाँड़ को अपने लिंग से छूने में कितना आनंद मिलता है?”
सुनीता ने ज्योतिजी को पलटने को कहा। अब सुनीता को ज्योतिजी की ऊपर से मालिश करनी थी।
सुनीता फिर वही ज्योतिजी का प्यारा सुन्दर करारा बदन देखने में ही खो गयी। बरबस ही सुनीता के हाथ ज्योति जी के अल्लड़ स्तनोँ पर टिक गए। वह उन्हें सहलाने और दबाने लगी। ज्योतिजी भी सुनीता के हाथों से अपने स्तनोँ को इतने प्यार से सहलाने के कारण मचल ने लगी। सुनीता ने झुक कर ज्योतिजी के नंगे उन्मत्त, पके फल की तरह फुले हुए स्तनोँ को चूमा और उनपर तेल मलना शुरू किया। साथ साथ वह उनकी पूरी फूली हुई गुलाबी निप्पलोँ को अपनी उँगलियों में दबाने और पिचका ने लगी।
सुनीता का गाउन सुनीता ने जाँघों के ऊपर तक उठा रखा था ताकि वह पलंग पर अपने पाँव फैलाकर ज्योति जी के बदन के दोनों और अपने पाँव टिका सके। ज्योतिजी को वहाँ से सुनीता की करारी जाँघें और उन प्यारी जाँघों के बिच सुनीता की चूत को छुपाती हुई सौतन समान कच्छी नजर आयी।
ज्योतिजी ने सुनीता का गाउन का निचला छोर पकड़ा और गाउन अपने दोनों हाथों से ही ऊपर उठाया जिससे उसे सुनीता की बाहों के ऊपर से उठाकर निकाला जा सके। सुनीता ने जब देखा की ज्योतिजी उसको नग्न करने की कवायद कर रही थी तो उसके मुंह और गालों पर शर्म की लालिमा छा गयी। वह झिझकती, शर्माती हुई बोली, “दीदी आप क्या कर रही हो?”
पर जब उसने देखा की ज्योतिजी उसकी कोई बात सुन नहीं रही थी, तो निसहाय होकर बोली, “यह जरुरी है क्या?”
ज्योतिजी ने कहा, “अरे पगली, मुझसे क्या शर्माना? अब क्या हमारा रिश्ता इन कपड़ों के अवरोध से रुकेगा? क्या तुमने अभी अभी यह वादा नहीं किया था की हम एक दूसरे से अपनी कोई भी बात या चीज़ नहीं छुपाएंगे? मैंने तो पहले ही बिना मांगें अपना पूरा बदन जैसा है वैसे ही तेरे सामने पेश कर दिया। तो फिर आओ मेरी जान, मुझसे बिना कोई अवरोध से लिपट जाओ।”
सुनीता बेचारी के पास क्या जवाब था? ज्योतिजी की बात तो सही थी। वह तो पहले से ही सुनीता के सामने नंगी हो चुकी थीं। सुनीता ने झिझकते हुए अपने हाथों को ऊपर उठाये और गाउन उतार दिया। सुनीता ब्रा और पैंटी में ज्योतिजी को अपनी टाँगों के बीच फँसा कर अपने घुटनों के बल पर ऐसे बैठी हुई थी जिससे ज्योतिजी के बदन पर उसका वजन ना पड़े।
अब ज्योति जी को सुनीता को निर्वस्त्र करने की मौन स्वीकृति मिल चुकी थी।
ज्योतिजी ने सुनीता की ब्रा के ऊपर से उठे हुए उभार को देखा और उन कामुक गोलों को छूने के लिये और पूरा निरावरोध देखने के लिए बेताब हो गयी। ज्योतिजी थोड़ा बैठ गयी और धीरे से सुनीता की पीठ पर हाथ घुमा कर ज्योतिजी ने सुनीता की ब्रा के हुक खोल दिए। सुनीता के अक्कड़ स्तन जैसे ही ब्रा का बंधन खुल गया तो कूद कर बाहर आ गए।
सुनीता ने देखा की अब ज्योतिजी से अपना बदन छुपाने का कोई फायदा नहीं था तो उसने अपने हाथ ऊपर किये और अपनी ब्रा निकाल फेंकी। ज्योतिजी मन्त्र मुग्ध सी उन फुले हुए प्यारे दो अर्धगोलाकार गुम्बजों को, जिनके ऊपर शिखर सामान गुलाबी निप्पलेँ लम्बी फूली हुई शोभायमान हो रही थी; को देखती ही रही।
ज्योतिजी ने अपनी बाँहें फैलायीं और उपरसे एकदम नग्न सुनीता को अपनी बाँहों में कस के जकड़ा और प्यार भरा आलिंगन किया। दोनों महिलाओं के उन्नत स्तन भी अब एक दूसरे को प्यार भरा आलिंगन कर रहे थे।
फिर सुनीता के बालों में अपनी उंगलियां फिराते हुए बोली, “मेरी प्यारी सुनीता, कसम से मैंने आज तक किसी महिला से प्यार नहीं किया। आज तुझे देख कर पता नहीं मुझे क्या हो रहा है। मैं कोई लेस्बियन या समलैंगिक नहीं हूँ। मुझे मर्दों से प्यार करवाना और चुदवाना बहुत अच्छा लगता है, पर यार तूम तो गजब की कामुक स्त्री हो। मेरी पति जस्सूजी की तो छोडो, वह तो मर्द हैं, तुम्हारे जाल में फंसेंगे ही, पर मैं भी तुम्हारे पुरे बदन और मन की कायल हो गयी। आज तुमने मुझे बिना मोल खरीद लिया।”
ज्योतिजी ने सुनीता की छाती के स्तनों पर उभरी हुई और चारों और से एरोला से घिरी उन फूली हुई निप्पलों को अपने मुंह में लिया और उन्हें चूसने लगी। साथ साथ में सुनीता के गोल गुम्बज सामान स्तनों को भी जैसे ज्योतिजी अपने मुंह में चूसकर खा जाना चाहती हो ऐसे उनको भी अपने मुंह में प्यार से लेकर चूसने, चूमने और चाटने लगी। दूसरे हाथ से ज्योतिजी ने सुनीता के दूसरे स्तन को दबाया और बोली, “आरी मेरी बहन, तेरी चूँचियाँ तो बाहर दिखती हैं उससे कहीं ज्यादा मस्त और रसीली हैं। इन्हें छुपाकर रखना तो बड़ी नाइंसाफी होगी।”
सुनीता उत्तेजना के मारे, “ओहहह… आहहह…” कराह रही थी। जब सुनीता ने ज्योतिजी की बात सुनी तो वह मुस्करा कर बोली, “दीदी, मेरी चूँचियाँ आपकी के मुकाबले तो कुछ भी नहीं।”
सुनीता ने पलंग पर ज्योतिजी का बदन अपनी टाँगों के बिच जकड कर रखा हुआ था। ज्योति जी ने जब अपनी आँखें खोली तो सुनीता की कच्छी नजर आयी। ज्योति ने सुनीता की कच्छी पर अपने हाथ फिराना शुरू किया तो सुनीता रुक गयी और बोली, “दीदी अब क्या है?”
ज्योति ने अपनी आँखें नचाते हुए कहा, “अरे कमाल है, क्या मैं तुम्हारे इस कमसिन, करारे बदन की सबसे खूबसूरत नगीने को छू नहीं सकती? मैं देखना चाहती हूँ की मेरी अंतरंग प्यारी और बला की खूबसूरत दोस्त की सबसे प्यारी चीज़ कितनी खूबसूरत और रसीली है।
सुनीता शर्म से सेहम गयी और बोली, “ठीक है दीदी। मुझे आदत नहीं है ना किसी और से बदन को छुआने की और वह भी वहाँ जहां आप ने छुआ, इसलिए थोड़ा घबरा गयी थी।”
ज्योतिजी ने भी जवाब में हँसते हुए काफी सन्दर्भ पूर्ण और शरारती इशारा करते हुए कहा, “अरे पगली आदत डालले! अब कई और भी मौके आएंगे किसी और से बदन को छुआने के। अब तुझे मेरा संग जो मिल गया है।” ऐसा कह कर ज्योति जी ने सुनीता की कच्छी (पैंटी) को सुनीता के घुटनों की और निचे खिसकाया। सुनीता ने अपने दोनों पांव एक तरफ कर कच्छी को निचे की और खिसका कर निकाल फेंकी।
दोनों स्त्रियां पूरी तरह निर्वस्त्र थीं। इन्सान जब भी इस दुनिया में आता है तो भगवान् उसे उसके शरीर की रक्षा के लिए मात्र चमड़ी के प्राकृतिक आवरण में ढक कर भेजते हैं। इन्सान उसी बदन को अप्राकृतिक आवरणों में छिपा कर रखना चाहता है, जिससे पुरुष और स्त्री का एक दूसरे के अंग देखने का कौतुहल बढे जिससे और ज्यादा कामुकता पैदा हो।
दोनों स्त्रियां कुदरत की भेंट सी किसी भी अप्राकृतिक आवरण से ढकी हुई नहीं थीं।
सुनीता फिर अपनी मूल पोजीशन में वापस आ गयी। ज्योतिजी सुनीता की टाँगों के बिच स्थित सुनीता की चूत पर हाथ फेर कर उसे सहलाने और दबाने लगीं।
सुनीता अपनी गाँड़ इधर उधर कर मचल रही थी। उसके जीवन में यह पहला मौक़ा था जब किसी महिला ने सुनीता बदन को इस तरह छुआ और प्यार किया हो। सुनीता इंतजार कर रही थी की जल्द ही ज्योतिजी की उंगलियां उसकी चूत में डालेंगीं और उसे उन्माद से पागल कर देंगीं। और ठीक वही हुआ।
सुनीता की चूत के ऊपर वाले उभार पर हाथ फिराते ज्योतिजी ने धीरेसे अपनी एक उंगली से सुनीता की चूत की पंखुड़ियों को सहलाना शुरू किया। सुनीता की यह कमजोरी थी की जब कभी उसके पति सुनीता को चुदवाने के लिए तैयार करना चाहते थे तो हमेशा उसकी चूत की पंखुड़ियों को मसलते और प्यार से रगड़ते। उस समय सुनीता तुरंत ही चुदवाने के लिए तैयार हो जाती थी।
ज्योतिजी ने धीरे से वही उंगली सुनीता की चूत में डालदी। धीरे धीरे ज्योतिजी सुनीता की चूत की पंखुड़ियों के निचे वाली नाजुक और संवेदनशील त्वचा को सहलाने और रगड़ने लगी। सुनीता इसे महसूस कर उछल पड़ी। उसे ताज्जुब हुआ की ज्योतिजी को महिलाओं की चूत को उत्तेजित करने में इतने माहिर कैसे थे। ज्योतिजी की सतत अपनी उँगलियों से सुनीता की चूत चोदने के कारण सुनीता की चूत में एक अजीब सा उफान उठ रहा था। सुनीता का पति सुनील सुनीता को उंगली डालकर उसे चोदते थे। पर जो निपुणता और दक्षता ज्योतिजी की उंगली में थी वह लाजवाब थी।
जब ज्योतिजी ने देखा की सुनीता अपनी चूत की ज्योतिजी की उँगलियों से हो रही चुदाई के कारण उन्मादित हो कर अपने घुटनों के बल पर ही मचल रही थी। तब ज्योतिजी ने सुनीता के बाँहें पकड़ कर उसे अपने साथ ही लेटने का इशारा किया। सुनीता हिचकिचाते हुए ज्योतिजी के साथ लेट गयी तब ज्योति जी बैठ गयी और थोड़ा सा घूम कर अपनी दो उँगलियों को सुनीता की चूत में घुसेड़ कर सुनीता की चूत अपनी उँगलियों से फुर्ती से चोदने लगीं।
अब सुनीता के लिए यह झेलना बड़ा ही मुश्किल था। सुनीता अपने आप पर नियंत्रण खो चुकी थी। पहली बार सुनीता की चूत किसी खबसूरत स्त्री अपनी कोमल उँगलियों से चोद रही थी। सुनीता की चूत से तो जैसे उन्माद का फव्वारा ही छूटने लगा। सुनीता की सिसकारियाँ अब जोर शोर से निकलने लगीं। सुनीता की, “आह… ओह… दीदी यह क्या कर रहे हो? बापरे…” जैसी उन्माद भरी सिसकारियोँ से पूरा कमरा गूंज उठा।
जैसे जैसे सुनीता की सिसकारियाँ बढ़ने लगीं, वैसे वैसे ज्योतिजी ने सुनीता की चूत को और तेजी से चोदना जारी रखा। आखिर में, “दीदी, आअह्ह्ह… उँह… हाय… ” की जोर सी सिसकारी मार कर सुनीता ने ज्योतिजी के हाथ थाम लिए और बोली, “बस दीदी अब मेरा छूट गया।” बोल कर सुनीता एकदम निढाल होकर ज्योतिजी के बाजू में ही लेट गयी और आँखें बंद कर शांत हो गयी।
सुनीता की जिंदगी में यह कमाल का लम्हा था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की वह कभी किसी स्त्री की उँगलियों से अपनी चूत चुदवाएगी। वही हुआ था। उस दिन तक सुनीता ने कभी इतना उन्माद का अनुभव नहीं किया था। काफी समय से अपने पति से चुद तो रही थी, चुदाई में आनंद भी अनुभव कर रही थी, पर सालों साल वही लण्ड, वही मर्द और वही माहौल के कारण चुदाई में कोई नवीनता अथवा उत्तेजना नहीं रही थी। उस दिन सुनीता ने वह उत्तेजना महसूस की।
उत्तेजना सिर्फ इस लिए नहीं थी की सुनीता की चूत किसी सुन्दर महिला ने अपनी उँगलियों से चोदी थी, पर उसके साथ साथ जो जस्सूजी के बारे में उन्मादक बातें हो रही थीं उसने आग में घी डालने का काम किया था। जस्सूजी का लण्ड, उनसे चुदवानिकी बातें जस्सूजी की बीबी से ही सुनकर सुनीता के जहन में कामुकता की जबरदस्त आग लगी थी।
उस सुबह सुनीता और ज्योतिजी के बिच की औपचारिकता की दिवार जैसे ढह गयी थी। सुनीता ने तो अपनी उन्मादक ऊँचाइयों को छू लिया था पर सुनीता को ज्योतिजी को उससे भी ऊँची ऊंचाइयों तक ले जाना था।
सुनीता ने थोड़ी देर साँस थमने के बाद फिर ज्योतिजी को पलंग पर लिटा दिया और फिर वह घुटनों के बल पर उनपर सवार हो गयी और बोली, “दीदी अब मेरी बारी है। आज आपने मुझे कोई और ही जन्नत में पहुंचा दिया। आज का मेरा यह अनुभव मैं भूल नहीं सकती।”
यह सुनकर ज्योतिजी मुस्करादीं और बोली, “अभी तो मैंने तुझे कहा उतनी ऊंचाइयों पर पहुंचाया है? अभी तो मैं और मेरे पति तुझे अकल्पनीय ऊंचाइयों तक ले जाएंगे।”
ज्योतिजी के गूढ़ार्थ से भरे वाक्य सुनकर सुनीता चक्कर खा गयी। उसे यकीन हो गया की ज्योतिजी जरूर उसे जस्सूजी से चुदवाने का सोच रही थी।
ज्योतिजी की बात का जवाब दिए बिना सुनीता अपने एक हाथ से ज्योतिजी की चूत के ऊपर का उभार सहलाने लगी और झुक कर सुनीता ने अपने होँठ ज्योतिजी के स्तनोँ पर रख दिए। सुनीता ने दुसरा हाथ ज्योतिजी के दूसरे स्तन पर रखा और वह उसे दबाने और मसलने लगी। अब मचलने की बारी ज्योतिजी की थी। सुनीता ने अपनी उँगलियाँ अपनी चूत में तो डाली थीं पर कभी किसी और स्त्री की चूत में नहीं डाली थीं।
उस दिन, पहली बार ज्योतिजी की चूत को सहलाते पुचकारते हुए सुनीता ने अपनी दो उंगलियां ज्योतिजी की चूत में डाल दीं। ज्योतिजी ने जैसे ही सुनीता की उँगलियों को अपनी चूत में महसूस किया तो वह भी मचलने लगी। सुनीता एक साथ तीन काम कर रही थी। एक तो वह ज्योतिजी की चूत अपनी उँगलियों से चोद रही थी, दूसरे उसका मुंह ज्योतिजी के उन्मत्त स्तनोँ को चूस रहा था और तीसरे वह दूसरे हाथ से ज्योतिजी का दुसरा स्तन दबा रही थी और उनकी निप्पल को वह उँगलियों में भींच रही थी।
सुनीता ने ज्योति से उनको उँगलियों से चोदते हुए धीरे से उनके कानों में कहा, “दीदी, एक बात पूछूं?”
ज्योतिजी ने अपनी आँखें खोलीं और उन्हें मटक कर पूछने के लिये हामी का इशारा किया।
सुनीता ने कहा, “दीदी सच सच बताना, क्या आप मेरे पति को पसंद करती हो?”
सुनीता की भोली सी बात सुनकर ज्योति हँस पड़ी और बोली, “मैंने तुझे पहले ही नहीं कहा? मैं उन्हें ना सिर्फ पसंद करती हूँ, पगली मैं उनके पीछे पागल हूँ। तुम बुरा मत मानना। वह तुम्हारे ही पति हैं और हमेशा तुम्हारे ही रहेंगे। मैं उनको छीनने की ना ही कोशिश करुँगी ना ही मेरी ऐसी कोई इच्छा है। पर मैं उनकी इतनी कायल हूँ की मैं सारी मर्यादाओं को छोड़ कर उनसे खुल्लमखुल्ला चुदवाना चाहती हूँ। मैंने आज तुझे मेरे मन की बात कही है। और ध्यान रहे, मैं अपने पति से भी कोई धोखाधड़ी नहीं करुँगी, क्यूंकि मैंने उनको भी इस बात का इशारा कर दिया है।”सुनील के बारे में ऐसी उत्तेजक बातें सुनकर ज्योति के जहन में भी काम की ज्वाला भड़क उठी। ज्योतिजी ने सुनीता से कहा, “बहन, तू भी बहुत चालु है। तू जानती है की मुझे कैसे भड़काना है। मैं तेरे पति के बारे में सोचती हूँ तो मेरी चूत में आग लग जाती है। उनकी गंभीरता, उनकी सादगी और उनकी शरारती आँखें मेरी चूत को गीली कर देती हैं। मैं जानती हूँ की आग दोनों तरफ से लगी है। अब तो तू मेरी बहन और अंतरंग सहेली बन गयी है ना? तो तू कुछ ऐसा तिकड़म चला की उनसे मेरी चुदाई हो जाए!”
फिर ज्योतिजी ने सोचा की उनकी ऐसी उटपटांग बात सुनकर कहीं सुनीता नाराज ना हो जाए, इस लिए वह थोड़ा सम्हाल कर सुनीता के सर पर हाथ फिराते हुए बोली, “बहन, मुझे माफ़ करना। मेरी बेबाकी में मैं कुछ ज्यादा ही बक गयी। मैं तुझे तेरे पति के बारे में ऐसी बातें कर परेशान कर रही हूँ।”
सुनीता ने जवाब में कहा, “दीदी, मैं जानती हूँ, मेरे पति आप पर फ़िदा हैं। और मैं उसे गलत नहीं समझती। आप जैसी कामुक बेतहाशा खूबसूरत कामिनी पर कौन अपनी जान नहीं छिड़केगा? अब तो हम दोनों ऐसे मोड़ पर आ गए हैं की क्या बताऊँ? मुझे ज़रा भी बुरा नहीं लगा दीदी, क्यूंकि मैं जानती हूँ की आप अपने पति जस्सूजी से बहुत प्यार करते हो। यही तो कारण है की आप मुझे उनसे चुदवाने के लिए ऐसे वैसे बड़ी कोशिश कर प्रोत्साहित कर रहे हो। कौन पत्नी भला अपने पति से चुदवाने के लिए किसी स्त्री को तैयार करेगी, जब तक की उसे अपने पति से बहुत प्यार ना हो और उन पर पूरा विश्वास ना हो?”
सुनीता की ऐसी कामुकता भरी बातें सुनकर ज्योतिजी गरम हो रहीथी। वैसे भी सुनीता के उँगलियों से चोदने से काफी गरम पहले से ही थी। ज्योतिजी की साँसे तेज चलने लगीं.. उन्होंने कहा, “सुनीता, मैं अब झड़ने वाली हूँ।”
सुनीता ने उँगलियों से चोदने की फुर्ती बढ़ाई और देखते ही देखते ज्योतिजी एक या दो बार पलंग पर अपने कूल्हे उठाके, “आह… ऑफ़… हायरे… ” बोलती हुई उछली और फिर पलंग पर अपनी गाँड़ रगड़ती हुई एकदम निढाल हो कर चुप हो गयी। उसकी साँसे तेज चल रही थी। ज्योतिजी का छूट गया और वह शांत हो गयी। परन्तु उनके मन में से अपन पति से सुनीता को चुदवाने का विचार अभी गया नहीं था। वह इस बात को पक्का करना चाहती थी।
साँस थमने ज्योतिजी ने सुनीता का हाथ अपने हाथ में ले कर पूछा, “मेरी प्यारी बहन, तू क्या बोलती है? जब तुझे सारी बातें साफ़ है तो फिर कुछ करते हैं जिससे तू जस्सूजी के लण्ड का अनुभव कर सके।”
ज्योति जी की बात सुनकर सुनीता थोड़ी सकपका गयी, क्यूंकि वह जो बोलने वाली थी उससे ज्योतिजी काफी हतोत्साहित हो सकती थी। सुनीता ने दबे स्वर में बड़ी ही गंभीरता से कहा, “दीदी मैं आपसे माफ़ी मांगना चाहती हूँ। पर दीदी, मैं आपसे एक बात बताना चाहती हूँ की ऐसा हो नहीं पाएगा। ऐसा नहीं है की मैं जस्सूजी को पसंद नहीं करती। मैं ना सिर्फ उन्हें पसंद करती हूँ बल्कि दीदी मैं आज आपसे नहीं छुपाउंगी की मैं मैं जब भी उनको देखती हूँ तब मैं उनपर वारी वारी जाती हूँ।
अगर आप की शादी उनसे नहीं हुई होती और अगर मैं उनसे पहले मिली होती तो मैं जरूर उनको आपके हाथों लगने नहीं देती। जैसे आपने उनको और स्त्रियों से छीन लिया था ऐसे मैं भी कोशिश करती की मैं उनको आपके हाथों से छीन लूँ और वह मेरे हो जाएं । पर अब जो हो चुका वह हो चुका। वह आपके हैं और हमेशा आपके रहेंगे। पर मेरी मजबूरी है की मेरी कितनी भी इच्छा होते हुए भी मैं आपकी मँशा पूरी नहीं कर सकती।”
सुनीता की बात सुनकर ज्योतिजी को बड़ा झटका लगा। उन्हें लगा था की सुनीता तो बस अब फँसने वाली ही है, पर यह तो सब उल्टापुल्टा हो रहा था। ज्योतिजी ने पूछा, “पर क्यों तुम ऐसा नहीं कर सकती? क्या तुम्हें अपने पति से डर है? या फिर लज्जा, या कोई धार्मिक आस्था का सवाल है? आखिर बात क्या है?”
सुनीता ने सरलता से कहा, “ज्योतिजी बात थोड़ी समझने में मुश्किल है। मैं एक राजपूतानी हूँ। मेरी माँ की मैं चहेती बेटी थी। मेरी माँ मुझसे सारी बातें स्पष्ट रूप से करती थीं। जब कोई लड़कों के बारेमें बात होती थी तो मुझे माँ ने बचपन से ही यह सिखाया था की औरत का शील ही उसका सबकुछ है। उसके साथ कभी छेड़ छाड़ मत करना।”
जब मैं थोड़ी बड़ी हुई और माँ ने देखा की ज़माना बदल चुका था। लड़के लडकियां एक दूसरे से इतनी मिलती जुलती थीं की उनमें एक दूसरे के प्रति आकर्षण होना और चुम्माचाटी आम बात हो गयी थी तब माँ ने अपनी सिख बदली और कहा, “ठीक है। आज कल ज़माना बदल चुका है। आज कल के जमाने में लड़का लड़की में कुछ चुम्माचाटी चलती है। तो चिंता की कोई बात नहीं। पर तुम अपना सब कुछ, अपना शील उसीको देना जो तुम्हारे लिए अपना जीवन तक छोड़ने के लिए तैयार हो और अपनी जान पर खेल कर तुम्हारी रक्षा करे।”
मेरी माँ की सिख मेरे लिए मेरे प्राण के सामान है। मैं उसको ठुकरा नहीं सकती। दीदी मैं आपको निराश कर के बहुत दुखी हूँ। आई एम् सो सॉरी। बल्कि सचमें तो मैं भी जस्सूजी की कायल हूँ और उनसे मुझे कोई परहेज भी नहीं है। मेरे पति तो उलटा जस्सूजी की बातें कर के मुझे छेड़ते रहते हैं। सिनेमा हॉल में उन्हों ने ही मुझे जस्सूजी के पास बिठा दिया था और जस्सूजी की और मेरी जो राम कहानी हुई थी वह सब मेरे पति सुनीलजी को पता है। आपकी जो मँशा है वही मेरे पति की भी है। मैंने आपको बता ही दिया है की कैसे जस्सूजी ने मेरे हाथों में अपना लण्ड पकड़ा दिया था और मैंने कैसे जस्सूजी को मेरी ब्रेस्ट्स से खेलने की भी इजाजत दे दी थी।”
ज्योतिजी सुनीता की बात सुनती रही। सुनीता ने ज्योतिजी की और देखा और बोली, “मेरे पति सुनील ने मेरे साथ शादी कर अपना सब कुछ मेरे हवाले कर दिया। वक्त आने पर वह मेरे लिए अपनी जान पर भी खेल सकते हैं तो मैं उनकी हो गयी। अब मैं अपनी माँ की बात कैसे ठुकराऊँ?”
ज्योतिजी सुनीता की बात सुन कर चुप हो गयी। शायद उनको लगा जैसे सुनीता ने उनके सारे मंसूबों पर ठंडा पानी डाल दिया। सुनीता ने महसूस किया की ज्योतिजी उसकी बातें सुनकर काफी निराश लग रहे थे।
सुनीता ने आगे बढ़ते हुए ज्योति दीदी का हाथ थमा और बोली, “दीदी, मैं आपका दिल तोड़ना नहीं चाहती। पर आप भी मेरे मन की बात समझिये। मैं मेरी माँ से वचन बद्ध हूँ। मेरी माँ की इच्छा और सिख की अवज्ञा करना उनका अपमान करने बराबर है। बस मैं आपसे इतना वादा करती हूँ की आप मेरे पति के साथ जब चाहे जहां चाहे सो सकती हैं, मतलब चुदवा सकतीं हैं। मुझे उसमें कोई एतराज ना होगा।
जहां तक मेरा सवाल है, मने मेरी मजबूरी बतायी। हाँ मैं जस्सूजी को जी जान से प्यार करती हूँ और करती रहूंगी। मैं कोशिश करुँगी की जो सुख मैं उनको नहीं दे सकती उसके अलावा जो सुख मैं उनको दे सकती हूँ वह उनको जरूर दूंगी। मैं प्रार्थना करुँगी की इस जनम में नहीं तो अगले जनम में ही सही मुझे जस्सूजी की शैयाभागिनी बनने का मौक़ा मिले।”
———————————————————————————————सुनील की पत्नी सुनीता की बात सुनकर जस्सूजी की पत्नी ज्योतिजी का मुंह छोटा हो गया। उनके मुंह पर लिखे निराशा और कुंठा के भाव सुनीता को साफ़ नजर आ रहे थे। वह खुद बड़ी निराश और दुखी महसूस कर रही थी। पर क्या करे? माँ को जो वचन दिया था। उसे तो निभाना ही था। सुनीता ने ज्योतिजी की और देखा। ज्योतिजी कुछ बोल नहीं पा रही रहीं। सुनीता को लगा की ज्योतिजी अब उससे बात नहीं करेंगी। निराश सी होकर वह उठ खड़ी हुई और कपडे पहनने लगी; तब ज्योतिजी ने सुनीता का हाथ थामा और बोली, “देखो बहन, तुम्हारी बात सही है की प्यारी माँ को दिया हुआ वचन तोड़ना नहीं चाहिए। पर एक बात को समझो। तुम्हारी माँ ने सबसे पहले तुम्हें जो सिख दी थी वह समय के चलते बदली थी की नहीं? बोलो?”
सुनीता ने ज्योति की तरफ देखा और मुंडी हिला कर कहा, “हाँ दीदी, बदली तो थी। पहले तो वह मुझे कोई लड़के से ज्यादा मिलने या बातचीत करने से ही मना कर रही थी; पर बाद में उन्होंने समय को बदलते हुए देखा तो छूआछुही और चुम्मा चाटी से आगे बढ़ने के लिए मना किया था।”
ज्योतिजी ने कहा, “देखो बहन, अगर तुम्हारी माँ आज होती ना, तो मुझे पक्का पता है की वह तुम्हें रोकती नहीं। क्यूंकि वह यह समझती की तुम अब बड़ी समझदार और परिपक्व हो गयी हो और अपना सही निर्णय तुम खुद ले सकती हो। मैं तुम्हें कोई जबरदस्ती नहीं कर रही। पर मैं तुम्हें जो मैंने कहा वह सोचने के लिए आग्रह जरुर करुँगी। बाकी निर्णय लेना तुम्हारे हाथमें है।”
सुनील की पत्नी सुनीता ने कर्नल साहब की पत्नी ज्योतिजी का हाथ थाम कर बड़ी विनम्रता से कहा, “दीदी, आप मुझसे नाराज तो नहीं हो ना? मैं आपकी छोटी बहन और अंतरंग सहेली बने रहना चाहती हूँ। कहीं मेरी यह सोच के कारण आप मुझसे रिश्ता ही ना रखना चाहो ऐसा तो नहीं होगा ना? हमारे दोनों के बिच अभी जो प्यार हुआ मैं उससे बहुत ही रोमांचित हूँ और उसके कारण आपके प्रति मेरा सम्मान और प्यार और भी बढ़ा है। अगर मैं आपको थोड़ी सी भी सेक्सी लगती हूँ और अगर आपको मेरे बदन से थोड़ा सा भी प्यार करने का मन करता हो तो मुझे ‘मालिश करने के लिए बुला लेना। हमारे बिच अभी जैसे हमने किया ऐसे प्यार करने का कोड होगा ‘मालिश’ करनी है’।”
सुनीता की प्यारी और मीठी सरल बोली सुनकर ज्योतिजी बरबस हँस पड़ी। सुनीता को गले लगाते हुए बोली, “शायद कर्नल साहब के भाग्य में तुम्हारी ‘मालिश’ करना लिखा नहीं। पर तुम उन्हें प्यार करने से तो नहीं रोकेगी ना? और हाँ, मैं तुम्हें जल्दी ही ‘मालिश’ करने के लिए बुलाऊंगी।”
सुनीता भी ज्योतिजी के साथ हँस पड़ी और बोली, “दीदी, मैं एक राज की बात कहती हूँ। मैं खुद भी आपका बार बार ‘मालिश’ करना चाहती हूँ और आपसे बार बार ‘मालिश’ करवाना चाहती हूँ। आपके पति से भी मैं बहुत प्यार करती हूँ। आपकी इजाजत हो तो मौक़ा मिलने पर मैं उनको बहुत प्यार दूँगी। और जहां तक उनसे ‘मालिश’ करवाने का सवाल है, तो क्या पता कल क्या होगा?”
बड़ी देर तक दोनों बहनें एक दूसरे से लिपटी रहीं और एक दूसरे की गीली आँखें पोछती रहीं और एक दूसरे की गीली चूत पर हाथ फिराती रहीं।
कहते हैं की समय सब का समाधान है। समय सारे दुःख और सुख को लाता है और ले भी जाता है। ज्योतिजी और सुनील की पत्नी को मिले हुए कुछ दिन हो गए। कर्नल साहब (जस्सूजी) और सुनील दोनों अपने काम में व्यस्त हो गए। स्कूल की छुट्टियां भी खत्म हो गयीं और जस्सूजी की पत्नी ज्योतिजी और सुनील की पत्नी सुनीता दोनों भी अत्याधिक व्यस्त हो गए।
देखते ही देखते गर्मियां शुरू हो गयीं। स्कूलों में परीक्षा की चिंता मैं पढ़ाई में लग गए थे। एक दिन शाम सुनील दफ्तर से घर पहुंचा ही था की कर्नल साहब का फ़ोन आया की उनके घर में चोरी हुई है। सुनील और सुनीता ने जब यह सूना तो वह दोनो भागते हुए कर्नल साहब के फ्लैट पहुंचे। उनके घर पुलिस आकर चली गयी थी। ड्राइंग रूम में सारा सामान बिखरा हुआ था।
सुनीता ने जस्सूजी की पत्नी के पास जा कर उनका हाथ थामा और पूछा की क्या हुआ था तो ज्योतिजी बोली, “समझ में नहीं आता। हम सब बाहर थे। दिन दहाड़े कोई चोर घरमें ताला तोड़ कर घुसा। चोर ने पूरा घर छान मारा। पर एक लैपटॉप, कुछ डायरियां और एक ही जूते को छोड़ कुछ भी नहीं ले गया। जूता ले गया तो भी बस एक। दुसरा जूता यहीं पड़ा है। पता नहीं, एक जूते को तो वह पहन भी नहीं सकता। उसका वह क्या करेगा? घर में इतनी महंगी चीजें हैं। मेरे गहने हैं। उन्हें छुआ तक नहीं। मेरी समझ में तो कुछ नहीं आता।”
सुनील ने कहा, “हो सकता है, अचानक ही कोई आ गया हो ऐसा उसे लगा तो जो हाथ आया उसे लेकर वह भाग निकला।”
जस्सूजी बड़ी गहरी सोचमें थे। उन्होंने कहा, “हो सकता है। पर हो सकता है कुछ और बात भी हो।”
सुनील कर्नल साहब की और आश्चर्य से देख कर बोलै, “आपको क्यों ऐसा लगता है की कुछ और भी हो सकता है?”
कर्नल साहब बोले, “वह इस लिए की पिछले कुछ दिनों से कोई मेरा पीछा कर रहा है। उसे पता नहीं की मैं जानता हूँ की वह मेरा पीछा कर रहा है। अगर यह चालु रहा तो एक ना एक दिन मैं उसे पकड़ पर पता कर ही लूंगा। पर इस बात में कुछ ना कुछ राज़ जरूर है।”
सुनील और उसकी पत्नी सुनीता कुछ समझ नहीं पाए और कुछ औपचारिक बातें कर अपने घर वापस लौट आये। कुछ दिनों में यह बात सब भूल गए।
गर्मी की छुट्टियां कुछ दिन के बाद शुरू होने वाली ही थीं। सुनील, कर्नल साहब उनकी पत्नी ज्योति और सुनील की पत्नी सुनीता एक दिन निचे कार पार्क में ही मिल गए , तब कर्नल साहब ने कहा, “सुनील और सुनीता सुनो। आर्मी में इस छुट्टियों में सामान्य नागरिकों के लिए आतंक विरोधी अभियान के तहत एक ट्रेनिंग एवं जागरूकता कार्यक्रम हिमाचल की पहाड़ियों में रखा है। इसमें नाम रजिस्टर करवाना है। कार्यक्रम सात दिनों का है। उसमें पहाड़ों में घूमना, तैराकी, शारीरिक व्यायाम, मनोरंजन इत्यादि कार्यक्रम हैं। सारा कार्यक्रम बड़ा रोमांचक होता है। मैं भी उसमें एक ट्रेनर हूँ। हमें तो जाना ही है। अगर आप की इच्छा हो तो आप भी शरीक़ हो सकते हो।”
ज्योतिजी सुनील की पत्नी ने सुनीता के करीब आयी, प्यार से उसका हाथ थामा और सुनीता के कानों में मुँह रख कर शरारत भरी आवाज में धीमे से बोलीं, “बहन चलो ना। राज की बात यह भी है की काफी दिन से मैंने तुमसे ‘मालिश’ भी नहीं करवाई। यह बहुत बढ़िया मौक़ा है। छुट्टियां हैं। घूमेंगे फिरेंगे और मजे करेंगे। तुम हाँ कह दोगी ना, तो सुनीलजी तो अपने आप ही आ जाएंगे।”
सुनील ने ज्योतिजी की और देखकर कहा, “अगर आप कहते हैं तो हम चलेंगे।” अपनी पत्नी सुनीता की और देखते हुए सुनील ने पूछा, “क्यों डार्लिंग, चलेंगें ना?”
सुनीता समझ गयी की ज्योतिजी के मन में कुछ जबरदस्त प्लान है। इतने करीब रहते हुए भी व्यस्तता के कारण पिछले कुछ दिनों से ज्योतिजी से मिलना भी नहीं हो पाया था। वह शर्माती हुई अपने पति की और देखती हुई बोली, “अगर आप कहेंगे तो भला मैं क्यों मना करुँगी? वैसे भी वेकेशन में हमें कहीं ना कहीं तो जाना ही है; तो क्यों ना हम इसी कार्यक्रम में हिस्सा लें? लगता है यह काफी रोमांचक और मजेदार होगा साथ साथ पहाड़ों में घूमना और एक्सरसाइज दोनों हो जाएंगे।”
तो फिर तय हुआ की पहाड़ों में छुट्टियां बिताने के लिए इस कार्यक्रम में सुनील और उनकी पत्नी सुनीता के नाम भी रजिस्टर कराएं जाएं। सब अपना सामान जुटाने में और तैयारी में लग गये।
उसी दिन शामको सुनील ने फ़ोन कर के कर्नल साहब को बताया की उसे उनसे कुछ जरुरी बात करनी है। बात फ़ोन पर नहीं हो सकती थी। कर्नल साहब आधे घंटे में ही सुनील और सुनीता के घर पहुँच गए।
सुनील डाइनिंग कुर्सी पर अपना सर पकड़ कर बैठे थे साथ में सुनीता उनसे कुछ सवाल जवाब कर रही थी। जब कर्नल साहब पहुंचे तो सुनील खड़ा हो गया और औपचारिकता पूरी होते ही उसने अपनी समस्या सुनाई।सुनीलजी ने कहा की वह जब शाम को मार्किट में गए थे तो उन्हें लगा की कोई उनका पीछा कर रहा था। पहले तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ की भला कोई उसका पीछा भी कर सकता है। पर चूँकि कर्नल साहब ने उन्हें बताया था की कुछ दिन पहले उनका भी कोई पीछा कर रहा था इसलिए सुनीलजी ने तय किया की वह भी ध्यान से देखेंगे की क्या वह बन्दा सचमुच उनका पीछा ही कर रहा था की या फिर वह सुनिलजी का वहम था। सुनीलजी चेक करने के लिए थोड़ी देर अचानक ही रुक गए। जब सुनीलजी रुक गए तो वह बन्दा भी रुक गया और दिखावा करने लगा जैसे वह कोई दूकान में सामान देख रहा हो।
दिखने में वह काफी लंबा और हट्टाकट्टा था। उसने कपड़े से अपना मुंह ढक रखा था। सुनील को लगा की शायद उन्हें वहम हुआ होगा। वह चलने लगे तो वह शख्श भी चलने लगा। तब सुनीलजी को यह यकीन हो गया की वह उनका पीछा कर रहा था। सुनील फुर्ती से एक गली में घुसे और कहीं छुप कर उस शख्श का इंतजार करने लगे।
जैसे ही वह शख्श उनके पास से गुजरा तो सुनील ने उसे ललकारा। सुनील ने उसे पूछा, “अरे भाई, तुम कौन हो, और मेरा पीछा क्यों कर रहे हो?”
सुनील की आवाज सुनकर उसने पलट कर देखा तो सुनीलजी पीछे से उसके करीब आने लगे। सुनीलजी को करीब आते हुए देख कर वह एकदम भाग खड़ा हुआ। सुनीलजी उसके पीछे दौड़ते हुए गये पर वह बन्दा अचानक कहीं गायब ही हो गया।
सुनीलजी ने कर्नल साहब से कहा, “जस्सूजी मैं वाकई में चिंतित हूँ। मैं यह समझ नहीं पाता हूँ की मेरा पीछा करने की जरुरत किसीको क्यों पड़ गयी? आखिर मेरे पास ऐसा क्या है? मेरी समझ में तो कुछ नहीं रहा।”
कर्नल साहब काफी चिंतित दिखाई दे रहे थे। उन्होंने सुनीलजी के कंधे पर हाथ फिराते हुए कहा, “आपके पास कुछ ऐसा है जिसकी किसीको जरुरत है। खैर, कोई बात नहीं। मैं पता लगाता हूँ और देखता हूँ की यह मसला क्या है।”
सुनील की पत्नी सुनीता जस्सूजी की बात सुनकर और भी चिंतित दिखाई दे रही थी। उसने कर्नल साहब से पूछा, “जस्सूजी, आखिर बात क्या है? इनका कोई पीछा क्यों करेगा भला? कुछ गड़बड़ तो नहीं? आप की बात से लगता है की हो ना हो आपको कुछ पता है जो हमें नहीं मालुम। कहीं आप हमसे कुछ छुपा तो नहीं रहे हो?”
कर्नल साहब रक्षात्मक हुए और बोले, “नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। मैं आपसे कुछ नहीं छुपाऊंगा। इतना तो जरूर है की कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो रहस्य जरूर है। पर जब तक मुझे पक्का पता नहीं चले तब तक क्या बताऊँ?”
सुनील ने पूछा, “जस्सूजी, क्या यह नहीं हो सकता की वह किसी और का पीछा कर न चाह रहा था और गलती से मुझे वह आदमी समझ कर मेरा पीछा कर रहा हो?”
जस्सूजी ने कहा, “हो भी सकता है। पर अक्सर ऐसे शातिर लोग इतनी बड़ी गलती नहीं करते।”
सुनीता को शक हुआ की जस्सूजी जरूर कुछ जानते थे पर बताना नहीं चाहते जब तक उन्हें पक्का यकीन ना हो। सुनीता इसका राज़ जानने के लिए बड़ी ही उत्सुक थी पर चूँकि जस्सूजी बताना नहीं चाहते थे इस लिए सुनीता ने भी उस समय उन्हें ज्यादा आग्रह नहीं किया। पर उसी समय सुनीता ने तय किया की वह इस रहस्य की सतह तक जरूर पहुचेंगी।
सुनीलजी ने कर्नल साहब को धन्यवाद कहा। जस्सूजी जब जाने के लिए तैयार हुए तो सुनीलजी ने सुनीता को कर्नल साहब को छोड़ने के लिए कहा और खुद घरमें चले गए। सुनीता जस्सूजी को छोड़ने के लिए घर से सीढ़ी उतर कर जब निचे उतरने लगी तब उसने जस्सूजी का हाथ पकड़ कर रोका और कहा, “जस्सूजी आप इसका राज़ जानते हैं। पर हमें बता क्यों नहीं रहें हैं। बोलिये क्या बात है?”
जस्सूजी ने सुनीता की और देखा और आँखें झुका कर बोले, “मैं आपको खामखा परेशानी में नहीं डालना चाहता। मैं खुद इसकी सतह तक पहुंचना चाहता हूँ पर क्या बताऊँ? वक्त आने पर मैं आपको खुद बताऊंगा। अभी आप मुझे इस बारेमें प्लीज आग्रह नहीं करें तो अच्छा है।”
इतना कह कर कर्नल साहब फुर्ती से सीढ़ियां निचे उतर गए। सुनीता उन्हें देखती ही रह गयी। जस्सूजी के जाने के तुरंत बाद सुनीता ने तय किया की वह जल्द ही जस्सूजी से बात कर उनसे इसके बारे में सारे राज़ बताने के लिए आग्रह करके मजबूर करेगी। पर उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था की उसे जस्सूजी से एकांत में मिलने का मौक़ा कब मिलेगा। पर दूसरे ही दिन यह मौक़ा मिल गया।
सुबह ही ज्योतिजी का फ़ोन आया। ज्योतिजी ने कहा, “सुनीता बहन एक समस्या हो गयी है। जस्सूजी को बुखार है और वह ऑफिस नहीं जा रहे। मेरी स्कूल में स्कूल के वार्षिक दिवस का कार्यक्रम है। मुझे तो जाना पडेगा ही। मैं गैर हाजिर नहीं रह सकती। तो क्या तुम अगर फ्री हो तो आज छुट्टी ले सकती हो? दिन में दो तीन बार जस्सूजी के पास जा कर उनकी तबियत का जायजा ले सकती हो प्लीज? मेरी बेटी भी बाहर ट्रेनिंग में गयी हुई है।”
यह सुन कर सुनीता खुश हो गयी। वह पिछली शाम से यही सोच रही थी की कैसे वह जस्सूजी से अकेले में बात करे। सुनीता ने फ़ौरन कहा, “ज्योतिजी आप निश्चिन्त जाइये। जस्सूजी की देखभाल मैं कर लुंगी। वह मेरे गुरु हैं और उनकी सेवा करना मेरा सौभाग्य होगा। मुझे आज स्कूल में कोई ख़ास काम है नहीं। ज्यादातर पीरियड फ्री हैं। मैं छुट्टी ले लुंगी।”
ज्योतिजी सुबह ही घर से निकल गयीं। सुनील के दफ्तर चले जाने के बाद सुनीता थोड़ा सा ठीकठाक होकर नहा धो कर फ्रेश हुई और ज्योतिजी और जस्सूजी के फ्लैट की और चल पड़ी। फ्लैट की घंटी बजायी तो जस्सूजी ने दरवाजा खोला। सुनीता ने देखा तो जस्सूजी तैयार हो रहे थे। उन्होंने बनियान और पतलून पहन रखा था और अपना यूनिफार्म पहनने जा रहे थे। जस्सूजी सुनीता को देख कर थम गए और आश्चर्य से बोल पड़े, “अरे सुनीता तुम, इस वक्त. यहां? क्या बात है?”शायद ज्योतिजी ने अपने पति को नहीं बताया था की उन्होंने सुनीता को आने के लिए कहा था।
सुनीता ने पूछा, “अरे आपको बुखार है ना? आप तैयार क्यों हो रहे हैं?”
जस्सूजी, “अरे ऐसा छोटा मोटा बुखार तो आता रहता है। इससे घबराएंगे तो काम कैसे चलेगा? लगता है तुम्हें ज्योति ने बता दिया है। ज्योति तो फ़ालतू में बात का बतंगड़ बना रही है।”
सुनीता ने आगे बढ़ कर जस्सूजी का हाथ थामा तो पाया की उनका बदन काफी गरम था। सुनीता ने जस्सूजी का हाथ सख्ती से पकड़ा और बोली, “यह छोटा मोटा बुखार है क्या? आपका बदन आग जैसे तप रहा है। अब हर बार आपकी नहीं चलेगी। चलो कपडे निकालो।”
कर्नल साहब यह सुनकर आश्चर्य से सुनीता की और देखने लगे और बोले, “कपडे निकालूँ? क्यों?”
जब सुनीता ने जस्सूजी के सवाल के बारेमें ध्यान से सोचा तो झेंप गयी। सुनीता को समझ आया की जस्सूजी कहीं उसकी कपडे निकालने वाली बात का गलत मतलब ना निकालें। उसने तुरंत ही कहा, “मेरा मतलब है, कपडे बदलो। ऑफिस जाने की कोई जरुरत नहीं है। आज आप घर में ही आराम करेंगे। यह मेरा हुक्म है।”
कर्नल साहब चुपचाप सुनीता की अधिकारपूर्ण आवाज सुन कर सकपका गए। आज तक कभी उन्होंने सुनीता की ऐसी सख्त आवाज सुनी नहीं थी। वह चुपचाप पीछे हटे, सुनीता को अंदर आने दिया और खुद एक हाथ का टेका ले कर सोफे पर बैठ गए। उनकी कमजोरी साफ़ दिख रही थी।
सुनीता ने कहा, “कपडे निकाल कर पयजामा पहन लीजिये। दफ्तर में फ़ोन करिये की आज आप नहीं आएंगे। मैं आपके सर पर ठन्डे पानी का कपड़ा लगा कर बुखार को कम करने की कोशिश करती हूँ।”
कर्नल साहब चुपचाप बैडरूम में अंदर चले गए और पतलून निकाल कर पजामा पहन कर पलंग पर लेट गए।
सुनीता ने बर्फ के कुछ टुकड़े निकाल कर एक कटोरी में डाले और एक साफ़ कपड़ा लेकर वह जस्सूजी के बगल में उनके सीने के पास ही अपने कूल्हे टिका कर पलंग पर बैठ गयी। जस्सूजी का बुखार काफी तेज था। सुनीता ने कपड़ा भिगोया और उसे निचोड़ कर जस्सूजी के कपाल पर लगाया और प्यार से उसे दबा कर जस्सूजी के सर पर हाथ फिराने लगी। जस्सूजी आँखें बंद कर सुनीता के कोमल हाथोँ के स्पर्श का आनंद ले रहे थे।
बिच में जब वह अपनी आँखें खोलते तो सुनीता के करारे, फुले हुए, ब्लाउज और ब्रा के अंदर से बाहर आने को व्याकुल मस्त स्तन उनकी आँखों और मुंह के ठीक सामने दीखते थे। सुनीता के स्तनोँ के बिच की गहरी खाई में से उसकी हल्के चॉकलेट रंग की एरोला की गोलाइयों में कैद निप्पलोँ की हलकी झांकी भी जस्सूजी को हो रही थी। सुनीता के बदन की खुसबू उनको पागल कर रही थी।
कई बार सुनीता के स्तन जस्सूजी के मुंह को और आँखों को अनायास ही स्पर्श कर रहे थे। सुनीता अपने काम में इतनी मशगूल थी की उसे इस बात का कोई भी ख़याल ही नहीं था की उसके मदमस्त स्तन जस्सूजी की हालत खराब कर रहे थे। सुनीता बार बार झुक कर कभी कपड़ा भिगो कर निचोड़ती तो कभी उसे जस्सूजी के कपाल पर दबा कर अपने हाथोँ से इनका कपाल और उनका सर प्यार से दबाती और अपना हाथ उस पर फिराती रहती थी।
जब सुनीता कर्नल साहब के सर पर कपड़ा दबाती तो उसे काफी झुकना पड़ता था जिसके कारण उसके स्तन जस्सूजी के मुंहमें ही जा लगते थे। कर्नल साहब ने कई बार कोशिश की वह उन्हें नजरअंदाज करे पर आखिर वह भी तो एक मर्द ही थे ना? कब तक अपने आपको रोक सकते थे? एक बार अचानक ही जब सुनीता झुकी और उसकी चूँचियाँ जस्सूजी के मुंह में जा लगीं तो बीन चाहे जस्सूजी का मुंह खुल गया और सुनीता का एक स्तन जस्सूजी के मुंह में घुस गया।
कर्नल साहब अपने आपको रोक नहीं पाए और उन्होंने सुनीता के स्तन को मुंह में लेकर वह उसे मुंह में ही दबाने और चूसने लगे। सुनीता ने ब्लाउज और ब्रा पहन रखी थीं, पर जस्सूजी के मुंह की लार से सुनीता का ब्लाउज और ब्रा भीग गए। सुनीता को महसूस हुआ की उसके स्तन जस्सूजी अपने मुंह में लेकर चूस रहे थे।
सुनीता को इस कदर अपने इतने करीब पाकर जस्सूजी का सर तो ठंडा हो रहा था पर उनके दो पॉंव के बिच उनका लण्ड गरम हो गया था। जल्दी में जस्सूजी ने अंदर अंडरवियर भी नहीं पहना था। उनका पयजामा के ऊपर उनके लण्ड के खड़े होने के कारण तम्बू जैसा बन गया था। सुनीता की पीठ उस तरफ थी इस कारण वह उसे देख नहीं सकती थी।
सुनीता ने जब पाया की जस्सूजी ने उसके एक स्तन को मुंह में लिया था तो वह एकदम घबड़ा गयी। उसने पीछे हटने के लिए एक हाथ का टेका लेने के लिए अपना हाथ पीछे किया तो वह जस्सूजी की टाँगों के बिच में जा पहुंचा। सुनीता ने अपना हाथ वहाँ टिकाया तो जस्सूजी का लण्ड ही उसके हाथ में आ गया। यह दूसरी बार हुआ की सुनीता ने जस्सूजी का लण्ड अपने हाथ में कपडे के दूसरी और महसूस किया था।
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