मा ने सारी उतार दिया था और अब वो केवल पेटिकोट और ब्लाउस में ही
खाना बना रही थी. उसने अपने कंधे पर एक छ्होटा सा तौलिया राक
लिया था और उसी से अपने माथे का पसीना पोच्च रही थी. मैं जब वाहा
पहुचा तो मा सब्जी को काल्च्चि से चला रही थी और दूसरी तरफ
रोटिया भी सेक रही थी. मैने कहा “कौन सी सब्जी बना रही हो केले
या बैगान की” मा ने कहा “खुद ही देख ले कौन
सी है”.
“खुसभू तो बरी आक्ची आ रही है, ओह लगता है दो दो सब्जी बनी है”
“खा के बताना कैसी बनी है”
“ठीक है मा, बेटा और कुच्छ तो ऩही करना” कहते कहते मैं एक दम
मा के पास आ के बैठ गया था. मा मोढ़े पर अपने पैरो को मोर के
और अपने पेटिकोट को जाँघो के बीच समेत कर बैठी थी. उसके बदन
से पसीने की अज़ीब सी खुसबु आ रही थी. मेरा पूरा ध्यान उसके जाँघो
पर ही चला गया था. मा ने मेरी र देखते हुए कहा “ज़रा खीरा
काट के सलाद भी बना ले”.
“वा मा, आज तो लगता है तू सारी ठंडी चीज़े ही खाएगी”
“हा, आज सारी गर्मी उतार दूँगी मैं”
“ठीक है मा, जल्दी से खाना खा के छत पर चलते है, बरी आक्ची
हवा चल रही है”
“ठीक है मा, जल्दी से खाना खा के छत पर चलते है, बरी आक्ची
हवा चल रही है”
मा ने जल्दी से थाली निकाली सब्जी वाले चूल्हे को बंद कर दिया, अब
बस एक या दो रोटिया ही बची थी, उसने जल्दी जल्दी हाथ चलना शुरू
कर दिया. मैने भी खीरा और टमाटर काट के सलाद बना लिया. मा ने
रोटी बनाना ख़तम कर के कहा “चल खाना निकाल देती हू बाहर आँगन
में मोढ़े पर बैठ के खाएँगे”. मैने दोनो परोसी हुई तालिया उठाई
और आँगन में आ गया . मा वही आँगन में एक कोने पर अपना हाथ
मुँह धोने लगी. फिर अपने छ्होटे तौलिए से पोचहते हुए मेरे सामने
रखे मोढ़े पर आ के बैठ गई. हम दोनो ने खाना सुरू कर दिया. मेरी
नज़रे मा को उपर से नीचे तक घूर रही थी. मा ने फिर से अपने
पेटिकोट को अपने घुटनो के बीच में समेत लिया था और इस बार
शायद पेटिकोट कुछ ज़यादा ही उपर उठा दिया था. चुचिया एक दम
मेरे सामने तन के खरी खरी दिख रही थी. बिना ब्रा के भी मा की
चुचिया ऐसी तनी रहती थी जैसे की दोनो तरफ दो नारियल लगा दिए
गये हो. इतना उमर बीत जाने के बाद भी थोरा सा भी ढलकाव ऩही
था. जंघे बिना किसी रोए के, एक दम चिकनी और गोरी और मांसल थी.
पेट पर उमर के साथ थोरा सा मोटापा आ गया था जिसके कारण पेट में
एक दो फोल्ड परने लगे थे, जो देकने में और ज़यादा सुंदर लगते थे.
आज पेटिकोट भी नाभि के नीचे बँधा गया था इस कारण से उसकी
गहरी गोल नाभि भी नज़र आ रही थी. थोरी देर बैठने के बाद ही
मा को पसीना आने लगा और उसके गर्दन से पसीना लुढ़क कर उसके
ब्लाउस के बीच वाली घाटी में उतरता जा रहा था, वाहा से वो पसीना
लुढ़क कर उसके पेट पर भी एक लकीर बना रहा था और धीरे धीरे
उसकी गहरी नाभि में जमा हो रहा था मैं इन सब चीज़ो को बरे गौर
से देख रहा था. मा ने जब मुझे ऐसे घूरते हुए देखा तो हसते हुए
बोली “चुप चाप ध्यान लगा के खाना खा समझा” और फिर अपने छ्होटे
वाले तौलिए से अपना पसीना पोच्छने लगी. मैं खाना खाने लगा और
बोला “मा सब्जी तो बहुत ही अच्छी बनी है”. मा ने कहा “चल तुझे
पसंद आई यही बहुत बरी बात है मेरे लिए, ऩही तो आज कल के
लार्को को घर का कुच्छ भी पसंद ही ऩही आता”. मैने कहा “ऩही मा
ऐसी बात ऩही है, मुझे तो घर का माल ही पसंद है,” ये माल साबद
मैने बरे धीमे स्वर में कहा था, की कही मा ना सुन ले. मा को
लगा की शायद मैने बोला है घर की दाल इसलिए वो बोली “मैं जानती
हू मेरा बेटा बहुत समझदार है और वो घर के दाल चावल से काम
चला सकता है उसको बाहर के मालपुए (एक प्रकार की खाने वाली चीज़,
जो की मैदे और चीनी की सहायता से बनाई जाती है और फूली हू पॅव की
तरह से दिखती है) से कोई मतलब ऩही है”. मा ने मालपुआ साबद पर
सहायद ज़यादा ही ज़ोर दिया था और मैने इस शब्द को पकर लिया. मैने
कहा “पर मा तुझे मालपुआ बनाए काफ़ी दिन हो गये, कल मालपुआ बना
ना” मा ने कहा “मालपुआ तुझे बहुत अक्चा लगता है मुझे पाता है
मगर इधर इतना टाइम कहा मिलता था जो मालपुआ बना साकु, पर अब
मुझे लगता है तुझे मालपुआ खिलाना ही परेगा”. मैने ने कहा “जल्दी
खिलाना मा”, और हाथ धोने के लिए उठ गया मा भी हाथ धोने के
लिए उठ गई. हाथ मुँह धोने के बाद मा फिर रसोई में चली गई और
बिखरे परे सामानो को सम्भलने लगी मैने कहा “छ्होरो ना मा, चलो
सोने जल्दी से, यहा बहुत गर्मी लग रही है” मा ने कहा “तू जा ना
मैं अभी आती, रसोई गंदा छ्होरना अच्छी बात ऩही है”. मुझे तो
जल्दी से मा के साथ सोने की हारबारी थी की कैसे मा से चिपक के
उसके मांसल बदन का रस ले साकु पर मा रसोई साफ करने में जुटी
हुई थी. मैने भी रसोई का समान संभालने में उसकी मदद करनी
शुरू कर दी. कुच्छ ही देर में सारा समान जब ठीक तक हो गया तो
हम दोनो रसोई से बाहर आ गये. मा ने कहा “जा दरवाजा बंद कर दे”.
मैं दौर कर गया और दरवाजा बंद कर आया अभी ज़यादा देर तो ऩही
हुआ था रात के 9:30 ही बजे थे. पर गाँव में तो ऐसे भी लोग जल्दी
ही सो जया करते है. हम दोनो मा बेटे छत पर आके बिच्छवान पर
लेट गये.
बिच्छवान पर मेरे पास ही मा भी आके लेट गई थी. मा के इतने पास
लेटने भर से मेरे सरीर में एक गुदगुदी सी दौर गई. उसके बदन से
उठने वाली खुसबु मेरी सांसो में भरने लगी और मैं बेकाबू होने
लगा था. मेरा लंड धीरे धीरे अपना सिर उठाने लगा था. तभी मा
मेरी ओररे करवट कर के घूमी और पुचछा “बहुत तक गये हो ना”
“हा, मा “
जिस दिन नदी पर जाना होता है, उस दिन तो थकावट ज़यादा हो ही जाती है”
“हा, बरी थकावट लग रही है, जैसे पूरा बदन टूट रहा हो”
“मैं दबा दू, थोरी थकान दूर हो जाएगी”
“ऩही रे, रहने दे तू, तू भी तो थक गया होगा”
“ऩही मा उतना तो ऩही थका की तेरी सेवा ना कर सकु”
मा के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई और वो हस्ते हुए बोली…..”दिन में इतना कुच्छ हुआ था, उससे तो तेरी थकान और बढ़ गई होगी”
“ही, दिन में थकान बढ़ने वाला तो कुच्छ ऩही हुआ था”. इस पर मा थोरा सा और मेरे पास सरक कर आई, मा के सरकने पर मैं भी थोरा सा उसकी र सरका हम दोनो की साँसे अब आपस में टकराने लगी थी. मा ने अपने हाथो को हल्के से मेरी कमर पर रखा और धीरे धीरे अपने हाथो से मेरी कमर और जाँघो को सहलाने लगी. मा की इस हरकत पर मेरे दिल की धरकन बढ़ गई और लंड अब फुफ्करने लगा था. मा ने हल्के से मेरी जाँघो को दबाया. मैने हिम्मत कर के हल्के से अपने कपते हुए हाथो को बढ़ा के मा की कमर पर रख दिया. मा कुछ ऩही बोली बस हल्का सा मुस्कुरा भर दी. मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैं अपने हाथो से मा के नंगे कमर को सहलाने लगा. मा ने केवल पेटिकोट और ब्लाउस पहन रखा था. उसके ब्लाउस के उपर के दो बटन खुले हुए थे. इतने पास से उसकी चुचियों की गहरी घाटी नज़र आ रही थी और मन कर रहा था जल्दी से जल्दी उन चुचियों को पकर लू. पर किसी तरह से अपने आप को रोक रखा था. मा ने जब मुझे चुचियों को घूरते हुए देखा तो मुस्कुराते हुए बोली, “क्या इरादा है तेरा, शाम से ही घूरे जा रहा है, खा जाएगा क्या”
“ही, मा तुम भी क्या बात कर रही हो, मैं कहा घूर रहा था”
“चल झूते, मुझे क्या पाता ऩही चलता, रात में भी वही करेगा क्या”
“क्या मा”
“वही जब मैं सो जौंगी तो अपना भी मसलेगा और मेरी च्चातियों को भी दबाएगा”
“ही, मा”
“तुझे देख के तो यही लग रहा है की तू फिर से वही हरकत करने वाला है”
“ऩही, मा” मेरे हाथ अब मा की जाँघो को सहला रहे थे.
“वैसे दिन में मज़ा आया था” पुच्छ कर मा ने हल्के से अपने हाथो को मेरे लूँगी के उपर लंड पर रख दिया. मैने कहा “ही मा, बहुत अच्छा लगा था”
“फिर करने का मन कर रहा है क्या”
“है, मा”
इस पर मा ने अपने हाथो का दवाब ज़रा सा मेरे लंड पर बढ़ा दिया और हल्के हल्के दबाने लगी. मा के हाथो का स्पर्श पा के मेरी तो हालत खराब होने लगी थी. ऐसा लग रहा था की अभी के अभी पानी निकल जाएगा. तभी मा बोली, “जो काम तू मेरे सोने के बाद करने वाला है वो काम अभी कर ले, चोरी चोरी करने से तो अच्छा है की तू मेरे सामने ही कर ले” मैं कुच्छ ऩही बोला और अपने काँपते हाथो को हल्के से मा की चुचियों पर रख दिया. मा ने अपने हाथो से मेरे हाथो को पकर कर अपनी च्चातियों पर कस के दबाया और मेरी लूँगी को आगे से उठा दिया और अब मेरे लंड को सीधे अपने हाथो से पकर लिया. मैने भी अपने हाथो का दवाब उसकी चुचियों पर बढ़ा दिया. मेरे अंदर की आग एकद्ूम भारक उठी थी और अब तो ऐसा लग रहा था की जैसे इन चुचियों को मुँह में ले कर चूस लू. मैने हल्के से अपने गर्दन को और आगे की र बढ़ाया और अपने होतो को ठीक चुचियों के पास ले गया. मा सयद मेरे इरादे को समझ गई थी. उसने मेरे सिर के पिच्चे हाथ डाला और अपने चुचियों को मेरे चेहरे से सता दिया. हम दोनो अब एक दूसरे की तेज़ चलती हुई सांसो को महसूस कर रहे थे. मैने अपने होतो से ब्लाउस के उपर से ही मा की चुचियों को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा मेरा दूसरा हाथ कभी उसकी चुचियों को दबा रहा था कभी उसके मोटे मोटे ****अरो को. मा ने भी अपना हाथ तेज़ी के साथ चलना शुरू कर दिया था और मेरे मोटे लंड को अपने हाथ से मुठिया रही थी. मेरा मज़ा बढ़ता जा रहा था. तभी मैने सोचा ऐसे करते करते तो मा फिर मेरा निकल देगी और सयद फिर कुच्छ देखने भी ऩही दे जबकि मैं आज तो मा को पूरा नंगा करके जी भर के उसके बदन को देखना चाहता था. इसलिए मैने मा के हाथो को पकर लिया और कहा “ही मा रूको”
“क्यों मज़ा ऩही आ रहा है क्या, जो रोक रहा है”
“ही मा, मज़ा तो बहुत आ रहा है मगर”
“फिर क्या हुआ,”
“फिर मा, मैं कुच्छ और करना चाहता हू, ये तो दिन के जैसे ही हो जाएगा”
इस पर मा मुस्कुराते हुए पुछि ” तो तू और क्या करना चाहता है, तेरा पानी तो ऐसे ही निकलेगा ना और कैसे निकलेगा”
“ही ऩही मा, पानी ऩही निकलना मुझे”
“तो फिर क्या करना है”
“ही मा, देखना है”
“ही, क्या देखना है रे”
“ही मा, ये देखना है” कह कर मैने एक हाथ सीधा मा के बुर पर रख दिया.
“ही, बदमाश, ये कैसी तमन्ना पल ली तूने”
“ही, मा बस एक बार दिखा दो ना”
“ऩही, ऐसा ऩही करते मैने तुम्हे थोरी च्छुत क्या दे दी तुम तो उसका फयडा उठाने लगे”
“ही, मा ऐसे क्यों कर रही हो तुम, दिन में तो कितना अcचे से बाते कर रही थी”
“ऩही, मैं तेरी मा हू, बेटा”
“ही, मा दिन में तो तुमने कितना अक्चा दिखाया भी था, थोरा बहुत”
“मैने कब दिखाया?, झूट क्यों बोल रहा है”
“ही, मा तुम जब पेशाब करने गई थी तब तो दिखा ही था”
“है, राम कितना बदमाश है रे तू, मुझे पाता भी ऩही लगा और तू देख रहा था, ही दैया आज कल के लौंदो का सच में कोई भरोसा ऩही, कब अपनी मा पर बुरी नज़र रखने लगे पाता ही ऩही चलता”
“ही मा ऐसा क्यों कह रही हो, मुझे ऐसा लगा जैसे तुम मुझे दिखा रही हो इसलिए मैने देखा”
“चल हट मैं क्यों दिखौँगी, कोई मा ऐसा करती है क्या”
“ही, मैने तो सोचा था की रात में पूरा देखूँगा”
“ऐसी उल्टी सीधी बाते मत सोचा कर, दिमाग़ खराब हो जाएगा”
“ही मा, ओह मा दिखा दो ना, बस एक बार, खाली देख कर सो जौंगा” पर मा ने मेरे हाथो को झटक दिया और उठकर खरी हो गई. अपने ब्लाउस को ठीक करने के बाद छत के कोने की तरफ चल दी. च्चत का वो कोना घर के पिच्छवारे की तरफ परता था और वाहा पर एक नाली (मोरी) जैसा बना हुआ था जिस से पानी बह कर सीधे नीचे बहने नाली में जा गिरता था. मा उसी नली पर जा के बैठ गई अपने पेटिकोट को उठा के पेशाब करने लगी. मेरी नज़रे तो मा का पिच्छा कर ही रही थी. ये नज़ारा देख के तो मेरा मन और बहक गया. दिल में आ रहा था की जल्दी से जाके मा के पास बैठ के आगे झनाक लू और उसके पेशाब करते हुए चूत को कम से कम देख भर लू. पर ऐसा ना हो सका. मा ने पेशाब कर लिया फिर वो वैसे ही पेतकोट को जाँघो तक एक हाथ से उठाए हुए मेरी तरफ घूम गई और अपने बुर पर हाथ चलाने लगी जैसे की पेशाब पोच्च रही हो और फिर मेरे पास आके बैठ गई. मैने मा के बैठने पर उसका हाथ पकर लिया और पायर से सहलाते हुए बोला “ही मा बस एक बार दिखा दो ना फिर कभी ऩही बोलूँगा दिखाने के लिए”
“एक बार ना कह दिया तो तेरे को समझ में ऩही आता है क्या”
“आता तो है मगर बस एक बार में क्या हो जाएगा”
“देख दिन में जो हो गया सो हो गया, मैने दिन में तेरा लंड भी मुठिया दिया था, कोई मा ऐसा ऩही करती, बस इससे आगे ऩही बढ़ने दूँगी”
मा ने पहली बार गंदे साबद का उपयोग किया था, उसके मुँह से लंड सुन के ऐसा लगा जैसे अभी झार के गिर जाएगा. मैने फिर धीरे से हिम्मत कर के कहा “ही मा क्या हो जाएगा अगर एक बार मुझे दिखा देगी तो, तुमने मेरा भी तो देखा है, अब अपना दिखा दो ना” “तेरा देखा है इसका क्या मतलब है, तेरा तो मैं बचपन से देखते आ रही हू, और रही बात चुचि दिखाने और पकरने की वो तो मैने तुझे करने ही दिया है ना क्यों की बचपन में तो तू इसे पाकर्ता चूस्ता ही था, पर चूत की बात और है, वो तो तूने होश में कभी ऩही देखा ना, फिर उसको क्यों दिखौ”. मा अब खुलाम कुल्ला गंदे सबदो का उपयोग कर रही थी.
जब इतना कुच्छ दिखा दिया है तो उसे भी दिखा दो ना ऐसा कौन सा कम हो जाएगा”. मा ने अब तक अपना पेटिकोट समेत कर जाँघो बीच राक लिया था और सोने के लिए लेट गई थी. मैने इस बार अपना हाथ उसके जाँघो पर रख दिया, मोटी मोटी गुदाज़ जाँघो का स्पर्श जानलेवा था. जाँघो को हल्के हल्के सहलाते हुए मैं जैसे ही हाथ को उपर की तरफ ले जाने लगा, मा ने मेरा हाथ पकर लिया और बोली “ठहर अगर तुझसे बर्दस्त ऩही होता तो ला मैं फिर से तेरा लंड मुठिया देती हू” कह कर मेरे लंड को फिर से पकर कर मुठियाने लगी पर मैं ऩही माना और एक बार केवल एक बार बोल के ज़िद करता रहा. मा ने कहा “बरा जिद्दी हो गया रे तू तो, तुझे ज़रा भी शरम ऩही आती अपनी मा को चूत देखने को बोल रहा है, अब यहा छत पर कैसे दिखौ अगाल बगल के लोग कही देख लेंगे तो, कल देख लियो”
“ही, कल ऩही अभी दिखा दे, चारो तरफ तो सुन-सान है फिर अभी भला कौन हमारे छत पर झकेगा”
“छत पर ऩही, कल दिन में घर में दिखा दूँगी, आराम से”
तभी बारिस की बूंदे तेज़ी के साथ गिरने लगी, ऐसा लग रहा था मेरी तरह आसमान भी बर ऩही दिखाए जाने पर रो परा है. मा कहा “ओह बारिश शुरू हो गई, चल जल्दी से बिस्तरा समेत नीचे चल के सोएंगे” मैं भी झट पट बिस्तेर समेटने लगा और हम दोनो जल्दी से नीचे की भागे. नीचे पहुच कर मा अपने कमरे में घुस गई मैं भी उसके के पिच्चे पिच्चे उसके कमरे में पहुच गया. मा ने खीरकी खोल दी और लाइट जला दिया. खीरकी से बरी अच्छी ठंडी ठंडी हवा आ रही थी मा जैसे ही पलंग पर बैठी मैं भी बैठ गया. और मा से बोला “ही, अब दिखा दो ना, अब तो घर में आ गये हम लोग” इस पर मा मुस्कुराते हुए बोली “लगता है आज तेरी किस्मत बरी आक्ची है आज तुझे मालपुआ खाने को तो ऩही पर देखने को ज़रूर मिल जाएगी”. फिर मा ने अपने अपना सिर पलंग पे टिका के अपने दोनो पैर सामने फैला दिए और अपने निचले होंठो को चबाते हुए बोली “इधर आ मेरे पैरो के बीच में अभी तुझे दिखती हू. पर एक बात जान ले तू पहली बार देख रहा है देखते ही तेरा पानी निकल जाएगा समझा” फिर मा ने अपने हाथो से पेटिकोट के निचले भाग को पाकारा और धीरे धीरे उपर उठाने लगी. मेरी हिम्मत तो बढ़ ही चुकी थी मैने धीरे से मा से कहा “ओह मा ऐसे ऩही” “तो फिर कैसे रे, कैसे देखेगा”
“ही मा, पूरा खोल के दिखाओ ना”
“पूरा खोल के से तेरा क्या मतलब है”
“ही पूरा कपरा खोल के, मेरी बरी तम्माना है की मैं तुम्हारे पूरे बदन को नंगा देखु, बस एक बार”
इतना सुनते ही मा ने आगे बढ़ के मेरे चेहरे को अपने हाथो में थाम लिया और हस्ते हुए बोली “वाह बेटा अंगुली पकर के पूरा हाथ पकरने की सोच रहे हो क्या”
“है मा, छ्होरो ना ये सब बात बस एक बार दिखा दो, दिन में तुम कितने अcचे से बाते कर रही थी और अभी पाता ऩही क्या हो गया है तुम्हे, सारे रास्ते सोचता आ रहा था मैं की आज कुछ करने को मिलेगा और तुम हो की…….” “अच्छा बेटा, अब सारा शरमाना भूल गया, दिन में तो बरा भोला बन रहा था और ऐसे दिखा रहा था जैसे कुच्छ जनता ही ऩही, पहले कभी किसी को किया है क्या, या फिर दिन में झूट बोल रहा था”
“है कसम से मा, कभी किसी को ऩही किया, करना तो दूर की बात है कभी देखा या छुआ तक ऩही”
“चल झुटे, दिन में तो देखा ही था और छुआ भी था”
“ही कहा मा, कहा देखा था”
“क्यों दिन में मेरा तूने देखा ऩही था क्या और च्छुआ भी था तुमने तो”
“है, हा देखा था, पर पहली बार देखा था, इससे पहले किसी का ऩही देखा था, तुम पहली हो जिसका मैने देखा था”.
“अक्चा इससे पहले तुझे कुच्छ पाता ऩही था क्या”
“ऩही मा, थोरा बहुत मालूम था”
“क्या मालूम था ज़रा मैं भी तो सुनू” कह कर मा ने मेरे लंड को फिर से अपने हाथो में पकर लिया और मुठियाने लगी. इस पर मैं बोला “ओह छ्होर दो मा, ज़यादा करोगी तो अभी निकल जाएगा”
“कोई बात ऩही अभी निकल ले अगर पूरा खोल के दिखा दूँगी तो फिर तो तेरा देखते ही निकल जाएगा, पूरा खोल के देखना है ना अभी”, इतना सुनते ही मेरा दिल तो बल्लियों उच्छलने लगा. अभी तक तो मा नखरा कर रही थी और अभी उसने अचानक ही जो दिखाने की बात कर दी मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे लंड से पानी निकल जाएगा.
“है मा, सच में दिखावगी ना”
“हा दिखौँगी मेरे राजा बेटा, ज़रूर दिखौँगी, अब तो तू पूरा जवान हो गया है और, काम करने लायक भी हो गया है, अब तो तुझे ही दिखना है सब कुच्छ और तेरे से अपना सारा काम करवाना है मुझे. मा और तेज़ी के साथ मेरे लंड को मुठिया रही थी और बार बार मेरे लंड के सुपरे को अपने अंगूठे से दबा भी रही थी. मा बोली “अभी जल्दी से तेरा निकल देती हू फिर देख तुझे कितना मज़ा आएगा, अभी तो तेरी ये हालत है की देखते ही झार जाएगा, एक पानी निकल दे फिर देख तुझे कितना मज़ा आता है”
“ठीक है मा निकल दो एक पानी, मैं तुम्हारा दबौउ?”
“पुचहता क्या है, दबा ना, पर क्या दबाएगा ये भी तो बता दे”, ये बोलते वाक़ूत मा के चेहरे पर एक शैतानी भारी कातिल मुस्कुराहट खेल गई.
“है, मा, वो तुम्हारी च्चाटिया मा, है”
“च्चाटिया? ये क्या होती है ये तो मर्दो की होती है औरतो का तो कुच्छ और होता है बता तो सही, नाम तो जनता ही होगा ना”
“चु…हु. .है मा मेरे से ऩही बोला जाएगा, छ्होरो नाम को”
“बोल ना शरमाता क्यों है, मा को खोल के दिखाने के लिए बोलने में ऩही शरमाता है पर अंगो के नाम लेने में शरमाता है”.
“है मा, तुम्हारी….. .”
“हा हा मेरी क्य……बोल”
“है मा तुम्हारी छुउूउची” ये साबद बोल के ही इतना मज़ा आ गया की लगा जैसे लॉरा पानी फेक देगा.
“हा अब आया ना लाइन पर, दबा मेरी चुचियों को इस से तेरा पानी जल्दी निकलेगा, है क्या भयनकार लॉरा है, पाता ऩही इस उमर में ये हाल है, जब इस छोकरे के लंड का, तो पूरा जवान होगा तो क्या होगा”
मैने अपने दोनो हथेलियो में मा की चुचिया भर ली और उन्हे खूब कस कस के दबाने लगा. ग़ज़ब का मज़ा आ रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे की मैं पागल हो जौंगा. दोनो चुचिया किसी अनार की तरह से सख़्त और गुदाज़ थी. उसके मोटे मोटे निपल भी ब्लाउस के उपर से पकर में आ रहे थे. मैं दोनो निपल के साथ साथ पूरी चुचि को ब्लाउस के उपर से पकर कर दबाए जा रहा था. मा के मुँह से अब सिसकारिया निकलने लगी थी और वो मेरा उत्साह बढ़ते जा रही थी.
“है बेटा शाबाश ऐसे ही दबा मेरी चुचियों को, है क्या लॉरा है, पाता ऩही घोरे का है या सांड का, ठहर जा अभी इसे चूस के तेरा पानी निकलती हू” कह कर वो नीचे की र झुक गई जल्दी से मेरा लंड अपने होंठो के बीच क़ैद कर लिया और सुपरे को होंठो के बीच दबा के खूब कस कस के चूसने लगी जैसे की पीपे लगा के कोई कोका-कोला पीटा है. मैं उसकी चुचियो को अब और ज़यादा ज़ोर से दबा रहा था, मेरी भी सिसकारिया निकलने लगी थी, मेरा पानी अब च्छुतने वाला ही था.